बुधवार, फ़रवरी 27, 2013

ॐ नमः शिवाय.....
























“मेरे लिये पाषाण की शिला और स्वर्ण की शिला में कोई अंतर नहीं" !

 मैं अपने भक्तों से भी यही अपेक्षा करता हूँ, कि वे भेदभाव न करें!
 क्योंकि ये सब मिट्टी से ही उपजा है! और एक दिन सबकुछ मिट्टी में
 ही मिल जायेगा!” – महादेव
ये तो अत्यंत साधारण सा तथ्य है, जिसे ईश्वर के सच्चे भक्त समझते भी हैं,

 और तदनुसार कार्य भी करते हैं! किन्तु अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और मोह के
 मद में चूर व्यक्तियों को समभाव में निहित दैवीय भावना समझ में नहीं आती!
 जो समझ गया, शिवत्व में लीन हो गया! जो नहीं, संभवतः, मात्र भस्म ही हुआ .....

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मंगलवार, फ़रवरी 05, 2013

क्रोध का अपना पुरा खानदान है.....




क्रोध का अपना पुरा खानदान है ॥ क्या आप जानते है ???

:•~ क्रोध की एक लाडली बहन है - जिद ॥
:•~ क्रोध की पत्नी है - हिंसा ॥
:•~ क्रोध का बडा भाइ है - अहंकार ॥
:•~ क्रोध का बाप जिससे वह डरता है - भय ॥
:•~ क्रोध की बेटीया है - निंदा और चुगली ॥
:•~ क्रोध का बेटा है - वैर ॥
:•~ इस खानदान की नकचढी बहु है - ईर्ष्या ॥
:•~ क्रोध की पोती है - ध्रूणा ॥
:•~ क्रोध की मां है - उपेक्षा ॥

तो क्रोध के खानदान से हमेंशा दुर रहीये..॥
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रविवार, जनवरी 27, 2013

प्रकृति मे कोई भी चीज़ नष्ट नहीं होती है, केवल उसका रूपांतरण होता है...



















विज्ञान का यह नियम है,कि प्रकृति मे कोई भी चीज़ नष्ट नहीं होती है,केवल उसका रूपांतरण होता है। जो लोग प्रकृति के अनुसार आचरण करते है, वे प्राकृतिक प्रकोपों के बीच भी सुरक्षित मिल जाते हैं। उदाहरणार्थ भोपाल गैस कांड के दौरान जहां सारे शहर मे त्राही-त्राही मची हुई थी,वहीं तीन परिवार पूरी तरह सुरक्षित पाये गए थे। बाद मे उन्होने जानकारी दी थी कि गैस लीकेज का आभास होते ही उन लोगों ने अपने-अपने घरों के खिड़की-दरवाजों पर गीले कंबल डाल कर भीतर 'हवन' प्रारम्भ कर दिया था।

'हवन' या 'यज्ञ' पूरी तरह 'पदार्थ विज्ञान' पर आधारित प्रक्रिया है। इसके अनुसार 'अग्नि' मे डाले गए पदार्थ 'परमाणुओं' मे विभक्त हो जाते हैं और 'वायु' द्वारा प्रवाहित किए जाते हैं। पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने मे 'हवन' या 'यज्ञ' धुरी का कार्य करते थे। इनके परित्याग से ही अति वृष्टि-अनावृष्टि,अति शीत अथवा अति ग्रीष्म की समस्याएँ आती हैं।

भोपाल कांड से सबक लेते हुये वाशिंगटन डी सी मे 'अग्निहोत्र विश्व विद्यालय की स्थापना की गई है, और वहाँ अनवरत 'अग्निहोत्र' चल रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप यू एस ए पर छाया ओज़ोन पर्त का छिद्र वहाँ भर गया है, और सरक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर आ गया है, जिसके परिणाम स्वरूप जापान मे 'सुनामी' आया और भारत मे भी आया था।

अति शीत और अति ग्रीष्म से भयभीत लोगों को अभी से 'हवन' का सहारा लेना चाहिए इर्द-गिर्द चाहे जो हो वे साफ-साफ सुरक्षित बच जाएँगे। गुजरात मे 'प्लेग' के कृत्रिम कीटाणुओं को छोड़े जाने पर जो विपदा आई थी, उसका समाधान राजीव गांधी सरकार की ओर से बटवाए गए हवन सामाग्री पैकटों  द्वारा हवन करने से हुआ था। यह कोई बहुत पुरानी बातें नहीं हैं। लोगों को अफवाहें फैला कर भय नहीं व्याप्त करना चाहिए बल्कि लोगों को समाधान बताना चाहिए .....

गुरुवार, जनवरी 17, 2013

ध्यान.....


























ध्यान ....मेरे गुरूजी कहते है की ध्यान उतना ही जरूरी है जितना खाना खाना या स्नान करना यां फिर सांस लेना,, उनका कहना है की चाहे कुछ भी क्यों न हो जाये लेकिन 24 घंटे में कम से कम आधा घंटा ध्यान तो करना ही चाहिए, उनका कहना है की चाहे हम कोई भी पूजा पद्धति अपनाये लेकिन उसका अंत ध्यान ही होता है क्योंकि ध्यान में ही समाधी अवस्था प्राप्त होती है ,, जिसमे परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है जिसमे सब विधि विधान, मंत्र जाप, पूजा , सब कुछ छूट जाता है , जब आप ध्यान करते है तो आस पास का वातावरण आपके अनूकुल हो जाता है और आपके अन्दर की Negativity धीरे धीरे दूर होना शुरू हो जाती है ..जो भी आपके लिए सही है कुदरत उस रास्ते पर आपको चलाना शुरू कर देती है , अगर आप शराब, सिगरेट, तम्बाकू , या फिर जुआ वगैरह नहीं छोड़ सकते तो ध्यान करना शुरू कर दीजिये ,, कुदरती सब आपके ही अनुकूल होता जायेगा


मंगलवार, जनवरी 15, 2013

नहीं घुटने टेकते कभी वीर....



















हो कितना भी विस्तृत, गहरा तिमिर, एक नन्हा दीपक, देता उसे चीर.... नहीं घुटने टेकते कभी वीर, संघर्ष कर, मत हो अधीर... हो कितना भी क्रोधित, तीव्र भंवर, नाविक ही जीते, ठान ले अगर... नहीं घुटने टेकते कभी वीर, संघर्ष कर, मत हो अधीर... हो कितना भी उत्तंग, हिम-शिखर, दृढ आरोही होते, विजयी उस पर.. नहीं घुटने टेकते कभी वीर, संघर्ष कर, मत हो अधीर... हो कितना भी तेरा, जीवन दुष्वर, कर कठिनाई से, युद्ध डट कर ... नहीं घुटने टेकते कभी वीर, संघर्ष कर, मत हो अधीर...

सोमवार, जनवरी 07, 2013

आंखों में पैदा हो जाएगा जादूई सम्मोहन इन आसान नुस्खों से ...














सामान्य कद-काठी वाले व्यक्ति में भी कई बार गजब का आकर्षण देखा गया है। यह अद्भुत आकर्षण उनकी आंखों के कारण ही होता है। आंखो की इसी चमत्कारी सम्मोहन शक्ति के दम पर अकेला व्यक्ति हजारों-लाखों की भीड़ को प्रभावित ही नहीं अपनी मर्जी के मुताबिक चला भी सकता है।
नीचे दिये जा रहे इन नुस्खों से आंखों में जादूई चमक पैदा कर सकते हैं
त्राटक या दीप त्राटक का अभ्यास  करें।
- किसी मार्गदर्शक के सहयोग से शीर्षासन या सर्वांगासन का नियमित अभ्यास   करें।
- ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं, दिन में कई बार आंखों पर ठंडे पानी के छींटे मारें।
- शुद्ध और प्राकृतिक आहार-विहार करें। बाजारू खाने से यथा संभव बचें।
- आंखों का काम करते समय बीच-बीच में कुछ समय के लिये आंखें बंद करके खोई हुई ऊर्जा को फिर से प्राप्त करें।
- किसी योग विशेषज्ञ से सीखकर या मार्गदर्शन में प्रतिदिन रात्रि के प्रथम और अंतिम पहर में 25 से 30 मिनिट तक बिन्दु पर ध्यान केंद्रित करें।
- सम्मोहन मंत्र ऊं शं सम्मोहनाय फट् का जप आज्ञाचक्र यानी दोनों भौंहों के बीच ध्यान केंद्रित करते हुए जपें।

गुरुवार, दिसंबर 27, 2012

वही व्‍यक्‍ति जीता है जो मरने के लिए तैयार है...


















" वही व्‍यक्‍ति जीता है जो मरने के लिए तैयार है। सच तो यह हे कि वही जीता है जो मृत्‍यु से राज़ी है। केवल वही व्‍यक्‍ति जीवन के योग्‍य है। क्‍योंकि वह भयभीत नहीं है, जो व्‍यक्‍ति मृत्‍यु को स्‍वीकार करता है, मृत्‍यु का स्‍वागत करता है, मेहमान मानकर उसकी आवभगत करता है। उसके साथ रहता है। वही व्‍यक्‍ति जीवन में गहरे उतर सकता है।

जब एक कुत्‍ता मरता है तो दूसरे कुत्‍ते को कभी पता नहीं होता की मैं भी मर सकता हूं। जब भी मरता है, कोई दूसरा ही मरता है। तो कोई कुत्‍ता कैसे कल्‍पना करे के मैं भी मरने वाला हूं। उसने कभी अपने को मरते नहीं देखा। सदा किसी दूसरे ही मरते है। वह कैसे कल्‍पना करे, कैसे निष्‍पति निकाले कि मैं भी मरूंगा। पशु को मृत्‍यु का बोध नहीं होता। इसलिए कोई पशु संसार का त्‍याग नहीं करता। कोई पशु संन्‍यासी नहीं हो सकता है।

केवल एक बहुत ऊंची कोटि की चेतना ही तुम्‍हें संन्‍यास की तरफ ले जा सकती है। मृत्‍यु के प्रति जागने से ही संन्‍यास घटित होता है। और अगर आदमी होकर भी तुम मृत्‍यु के प्रति जागरूक नहीं हो तो तुम अभी पशु ही हो। मनुष्‍य नहीं हुए हो। मनुष्‍य तो तुम तभी बनते हो जब मृत्‍यु का साक्षात्‍कार करते हो। अन्‍यथा तुममें और पशु में कोई फर्क नहीं है। पशु और मनुष्‍य में सब कुछ समान है, सिर्फ मृत्‍यु फर्क लाती है। मृत्‍यु का साक्षात्‍कार कर लेने के बाद तुम पशु नहीं रहते। तुम्‍हें कुछ घटित हुआ है जो कभी किसी पशु को घटित नहीं होता है। अब तुम एक भिन्‍न चेतना हो। "

~ ओशो, विज्ञानं भैरव तंत्र

रविवार, दिसंबर 02, 2012

बंधन.........




















बंधन - आत्‍माओं को मार डालते है, सड़ा डालते है।

जीवन को जबरदस्‍ती बंधनों में जीने से उचित है कि आदमी स्‍वतंत्रता से जीए। और बंधन जितने टूट जाएं उतना अच्‍छा है। क्‍योंकि बंधन केवल आत्‍माओं को मार डालते है, सड़ा डालते है। तुम्‍हारे जीवन को दूभर कर देते है।

जीवन एक सहज आनंद, उत्‍सव होना चाहिए। इसे क्‍यों इतना बोझिल, इसे क्‍यों इतना भारी बनाने की चेष्‍टा चल रही है? और मैं नहीं कहता हूं कि अपनी स्‍व-
स्‍फूर्त चेतना के विपरीत कुछ करो। किसी व्‍यक्‍ति को एक ही व्‍यक्‍ति के साथ जीवन-भर प्रेम करने का भव है—सुंदर है, अति सुंदर है। लेकिन यह भाव होना चाहिए आंतरिक। यह ऊपर से थोपा हुआ नहीं। मजबूरी में नहीं। नहीं तो उसी व्‍यक्‍ति से बदला लेगा वह व्‍यक्‍ति, उसी को परेशान करेगा। उसी पर क्रोध जाहिर करेगा।

शनिवार, नवंबर 10, 2012

ले आतिशबाजी न करने का संकल्प.......


















 आज प्रकृति असंतुलित  हो रही है,इसके  लिए मानव ही जिम्मेदार है।
ऐसे में हमें सचेत हो जाने की आवश्यकता है।दीपावली 
अध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण है,साथ ही वैज्ञानिक रूप से
भी इसका महत्व है,तेल व घी से दिए जलाये जाते है,इससे 
वातावरण शुद्ध होता है,और कीड़े -मकोड़े मरते है,पटाखा छोड़ने 
का बहुत ही खतरा है,इससे निकलने वाला गैस भी हानिकारक है।
दीपावली दीयों का पर्व है न की आतिशबाजी का,आतिशबाजी का 
बहुत ही नुकसान है,रात भर आतिशबाजी से लोगों की नींद हराम 
 होती है,लोगों को  साँस लेने में परेशानी होती है,इससे पैसे की 
बर्बादी होती है,आतिशबाजी से हमें बचना चाहिए और हम सभी 
को आतिशबाजी न करने का संकल्प लेना चाहिए ....

बुधवार, सितंबर 12, 2012

सुसंस्कृत सन्तान के लिए पूर्व तैयारी आवश्यक......



















एक महात्मा के पास एक सती गई और बोली-महाराज चरणोदक दें तो मेरे गर्भ का बालक भी महान् बने। सन्त ने कहा-बेटी चरणोदक और आशीर्वाद से नहीं तुम्हारे रहन-सहन आहार-बिहार और आत्मिक शुद्धता से सन्तान महान् बनेगी।           
कपिल मुनि जिस रास्ते से गुरुकुल जाते, उसमें एक विधवा का घर पड़ता, विधवा की निर्धनता से दुःखी होकर वे एक दिन उसके पास जाकर बोले तुम चाहो तो आर्थिक सहायता का प्रबन्ध करा दूँ। विधवा ने कहा-मुनिवर आपने भूल की, मेरे तो एक अत्यन्त अमूल रत्न है? मुनि ने चारों तरफ दृष्टि दौड़ाई, कुछ दिखा नहीं। वे पूछ बैठे क्या वह रत्न मुझे भी दिखायेगी। अभी यह बात हो ही रही थी कि उसका पुत्र पढ़कर लौटा उसने माँ के पैर छूकर कहा-माँ आज भी मैंने अपना पाठ ठीक तरह पढ़ा लाओ कुल्हाड़ी अब लकड़ियाँ ले आऊँ? कपिल बच्चे के संस्कारों से बड़े प्रभावित हुए उन्होंने कहा-सचमुच संस्कारवान् पुत्र और रत्न में कोई अन्तर नहीं।
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गुरुवार, अगस्त 30, 2012

यह संसार कर्मफल व्यवस्था के आधार पर चल रहा है.....

























यह संसार कर्मफल व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। 
जो जैसा बोता है वह वैसा काटता है। क्रिया की प्रतिक्रिया 
होती है। पेण्डुलम एक ओर चलता है तो लौट कर उसे फिर
 वापिस अपनी जगह आना पड़ता है। गेंद को जहाँ फेंक कर 
मारा जाय वहाँ से लौट कर उसी स्थान पर आना चाहेगी जहाँ
 से फेंकी गई थी। शब्द वेदी बाण की तरह भले बुरे विचार 
अन्तरिक्ष में चक्कर काट कर उसी मस्तिष्क पर आ विराजते हैं,
 जहाँ से उन्हें छोड़ा गया है। कर्म के सम्बन्ध में भी यही बात है।
 दूसरों के हित अनहित के लिए जो किया गया है उसकी प्रतिक्रिया
 कर्ता के ऊपर तो अनिवार्य रूप से बरसेगी, जिसके लिए वह कर्म
 किया गया था, उसे हानि या लाभ भले ही न हो। गेहूँ से गेहूँ
 उत्पन्न होता है और गाय अपनी ही आकृति प्रकृति का बच्चा जनती है। कर्म के सम्बन्ध में भी यही बात है, उनके प्रतिफल निश्चित रूप से उत्पन्न होते हैं। यदि ऐसा न होता तो इस सृष्टि में घोर अँधेरा छाया हुआ दिखता। तब कोई कुछ भी कर गुजरता और प्रतिफल की चिन्ता न करता।
 आज का बोया बीज कुछ समय बाद फल देता है- आज का जमाया दूध कल दही बनता है-आज का आरम्भ किया अध्ययन, व्यायाम, व्यवसाय तत्काल फल नहीं देता उसकी प्रतिक्रिया उत्पन्न होने में कुछ समय लग जाता है। इसी विलम्ब में मनुष्य की दूरदर्शिता और बुद्धिमतां की परीक्षा है। यदि तत्काल फल मिला करते तो किसी के भले बुरे का निर्णय करने की आवश्यकता ही न पड़ती। झूठ बोलने वाले का मुँह सूज जाया करता, कुदृष्टि डालने वालों की आँखें दर्द करने लगतीं, चोरी करने वालों के हाथों में गठिया हो जाता, तो फिर कोई व्यक्ति कुकर्म करता ही नहीं। ईश्वर ने मनुष्य के निजी विवेक और कर्म स्वातंत्र्य को कार्यान्वित होते रहने के लिए कर्म और फल के बीच अन्तर रखा है। इस धैर्य परीक्षा में जो असफल रहते हैं, वे सत्कर्मों की सुखद सम्भावना पर अविश्वास करके उन्हें छोड़ बैठते हैं और कुकर्मों का हाथों हाथ फल न मिलते देख कर उन पर टूट पड़ते हैं। ऐसी ही अदूरदर्शिता के कारण पक्षी बहेलिये के जाल में फँसते हैं, वे दाना देखते हैं फन्दा नहीं। आटे के लोभ में मछली अपनी गला फँसाती है और बेमौत मारी जाती है। चासनी के लाभ में अन्धाधुन्ध घुस पड़ने वाली मक्खी के पंख चिपक जाते हैं और तड़पते हुए प्राण जाते हैं। यह अदूरदर्शी प्राणी दुर्गति के शिकार बनते हैं। कर्मफल के अनिश्चित होने की बात सोच कर ही मनुष्य कुमार्ग पर चलते हैं- कुकर्म करते हैं और दुर्दशा के जंजाल में फँसते हैं।
 भगवान ने संसार बनाया और उसके साथ साथ ही कर्म प्रतिफल का सुनिश्चित संविधान रच दिया। अपनी निज की लीलाओं में भी उसने इस लक्ष्य को प्रकट किया है। भगवान राम ने बालि को छिपकर तीर मारा, अगली बार कृष्ण बन कर जन्मे राम को उस बहेलिया के तीर का शिकार होना पड़ा, जो पिछले जन्म में बालि था। राम के पिता दशरथ ने श्रवण कुमार के तीर मारा, उसके पिता ने शाप दिया कि युधकर्ता को मेरी तरह ही पुत्र शोक में बिलख बिलख कर मरना पड़ेगा। वैसा ही हुआ भी। राम अपने पिता की सहायता न कर सके और उन्हें कर्म का प्रतिफल भुगतना पड़ा। 
 चक्रव्यूह में फँस कर अभिमन्यु मारा गया, तो उसकी माता सुभद्रा ने अपने भाई कृष्ण से कहा, तुम तो अवतार थे तो फिर अपने भाँजे और अजुर्न सखा के पुत्र को क्यों नहीं बचाया। कृष्ण ने विस्तार पूर्वक कर्म फल की प्रबलता का वर्णन करते हुए सुभद्रा का समाधान किया कि भगवान से भी प्रारब्ध बड़ा है। कर्म फल भुगतने की विवशता हर किसी के लिए आवश्यक हैं।
 कर्म फल की सुनिश्चितता का तथ्य ऐसा है, जिसे अकाट्य ही समझना चाहिए। किये हुए भले बुरे कर्म अपने परिणाम सुख-दुःख के रूप में प्रस्तुत करते रहते हैं। दुःखों से बचना हो तो दुष्कर्मों से पिण्ड छुड़ाना चाहिए, सुख पाने की अभिलाषा हो तो सत्कर्म बढ़ाने चाहिए। ईश्वर को प्रसन्न और रुष्ट करने सत्कर्मों एवं दुष्कर्मों के आधार पर ही बन पड़ता है। शारीरिक एवं मानसिक रोग दुष्कर्मों के फल स्वरूप ही सामने आते हैं। आधि दैविक, आधि भौतिक आध्यात्मिक संकट भी इन्हीं अनाचरणों के कारण उत्पन्न होते हैं। इन विपत्तियों से बचने का एक ही उपाय है कि वर्तमान गतिविधियों का सजजनतापूर्ण निर्धारण किया जाय। भविष्य में दुष्कर्मों से विरत रहने का सुदृढ़ संकल्प किया और उसे निबाहा जाय। साथ ही भूत काल में जो कुकर्म बन पड़े हैं, उनका साहस पूर्वक प्रायश्चित किया जाय। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण का यही कारगर उपाय है।


शनिवार, अगस्त 25, 2012

यह मत पूछिए कि हम क्या करें? यह पूछिए कि क्या बनें?

साधकों में से कई व्यक्ति हमसे यह पूछते रहते हैं कि हम क्या करें? मैं उनमें से हर एक से कहता हूँ कि यह मत पूछिए, बल्कि यह पूछिए कि क्या बनें? अगर आप कुछ बन जाते हैं तो करने में भी ज्यादा कीमती है वह। फिर जो कुछ भी कुछ भी आप कर रहे होंगे, वह सब सही हो रहा होगा। आप साँचा बनने की कोशिश करें। अगर आप साँचा बनेंगे तो जो भी गीली मिट्टी आपके सम्पर्क में आएगी, आपके ही तरीके के, आपके ही ढंग के, शक्ल के खिलौने बनते हुए चले जाएँगे। आप सूरज बनें तो आप चमकेंगे और चलेंगे। उसका परिणाम क्या होगा? जिन लोगों के लिए आप करना चाहते हैं, वे आपके साथ-साथ चमकेंगे और चलेंगे।..... हम चलें, हम प्रकाशवान हों, फिर देखेंगे कि जिस जनता के लिए आप चाहते थे कि वह हमारी अनुगामी बने और हमारी नकल करे तो वह ऐसा ही करेगी। आप देखेंगे कि आप चलते हैं तो दूसरे लोग भी चलते हैं।..... हमको बीजों की जरूरत है। आप बीज बनिए, गलिए, वृक्ष बनिए और अपने भीतर से ही फल पैदा करिए और प्रत्येक फल में से ढेरों के बीज पैदा कीजिए। आप अपने भीतर से ही बीज क्यों नहीं बनाएँ?
मित्रो! जिन लोगों ने अपने आपको बनाया है, उनको यह पूछने की जरूरत नहीं पड़ी कि क्या करेंगे? उनकी प्रत्येक क्रिया इस लायक बन गई कि उनकी क्रिया ही सब कुछ करा सकने में समर्थ हो गई। उनका व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक रहा कि प्रत्येक सफलता को और प्रत्येक महानता को सम्पन्न करने के लिए काफी था।..... गाँधी जी ने अपने आपको बनाया था तभी हजारों आदमी उसके पीछे चले। बुद्ध ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चले।..... समाज की सेवा भी करनी चाहिए, पर मैं यह कहता हूँ कि समाज-सेवा से भी पहले ज्यादा महत्त्वपूर्ण इस बात को आप समझें कि हमको अपनी ‘क्वालिटी’ बढ़ानी है।..... हम अपने आपको फौलाद बनाएँ। अपने आपकी सफाई करें। अपने आपको धोएँ। अपने आपको परिष्कृत करें। इतना कर सकना यदि हमारे लिए सम्भव हो जाए तो समझना चाहिए कि आपका यह सवाल पूरा हो गया कि हम क्या करें? क्या न करें? आप अच्छे बनें। समाज-सेवा करने से पहले यह आवश्यक है कि हम समाज-सेवा के लायक हथियार तो अपने आपको बना लें। यह ज्यादा अच्छा है कि हम अपने आपकी सफाई करें।

शुक्रवार, अगस्त 17, 2012

प्रत्येक व्यक्ति संसार में किसी-न-किसी विशेष उद्देश्य से आता है

















 
प्रत्येक व्यक्ति संसार में किसी-न-किसी विशेष उद्देश्य से आता है 
और उसका यह एक जन्मजात स्वभाव भी होता है।वह उस उद्देश्य 
को पूरा करते हुए स्वभाव के अनुसार कर्म करने में समर्थ होता है। 
इसके विपरीत जाने के लिए वह स्वतंत्र नहीं। उदाहरण के रूप में 
अर्जुन को लीजिए, पृथ्वी के भार को दूर करने के विशेष उद्देश्य से 
उसका जन्म हुआ था। अतएव इस कार्य में वह परतंत्र हुआ। उसे 
यह कार्य करना ही होगा। ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहता 
हुआ उन्हें घुमाता रहता है। हमारे शरीर के भीतर जितने रक्त के कण 
हैं, वे जिस स्थान पर हैं, वहीं रहने के लिए विवश हैं। कहा जा सकता है 
कि हमारी शक्ति उनके भीतर है और हम उनको संचालित करते हैं, परंतु 
वे अपने स्थान पर रहते हुए अपनी चेष्टाओं में स्वतंत्र हैं। ऐसे ही ईश्वर 
द्वारा नियुक्त स्थान पर रहते हुए, संसार में अपने आने के विशेष उद्देश्य 
को पूर्ण करते हुए मनुष्य अपनी दूसरी चेष्टाओं में स्वतंत्र है। यही है मनुष्य 
का कर्म-स्वातंत्र्य। इसीलिए भगवान ने ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कहा है, 
केवल कर्म में अधिकार है, स्वभाव परिवर्तन या ईश्वर के दिए स्थान-परिवर्तन 
में नहीं।मा फलेषु कदाचन्—फल में तेरा अधिकार कभी नहीं है। अत: कर्म
का यह फल होगा ही या यह फल होना चाहिए, ऐसा सोचकर कर्म करने वाले
सर्वदा दु:ख पाते हैं।

गुरुवार, जुलाई 26, 2012

परमात्मा दूर नहीं है फिर ....

























सुख को भोगो दुःख को समझो परमात्मा दूर नहीं है फिर ....
सुख को जिओ दुःख को पहचानो मोक्ष दूर नहीं है फिर ......
सुख को पहचानो... पहचानते -पहचानते महासुख हो जायेगा ....
दुःख को पहचानते -पहचानते दुःख के कारण तिरोहित हो जायेगा उस घडी को ही सच्चिदानंद कहा गया है .

बुधवार, जुलाई 25, 2012

कोई विकल्प है नहीं.............





















मिठाई-मिठाई रटते रहने और उनके स्वरूप-स्वाद का 
आलंकारिक वर्णन करते रहने भर से न तो मुँह मीठा होता है,
और न पेट भरता है। उसका रसास्वादन करने और लाभ उठाने 
का तरीका एक ही है, कि जिसकी भावभरी चर्चा की जा रही है, 
उसे खाया ही नहीं, पचाया भी जाय। धर्म उसे कहते हैं, जो धारण
 किया जाय। उस आवश्यकता के पूर्ति के लिए कथा-प्रवचनों को 
कहते-सुनते रहना भी कुछ कारगर न हो सकेगा। बात तो तभी बनेगी, 
जब जिस प्रक्रिया का माहात्म्य कहा-सुना जा रहा हो, उसे व्यवहार
 में उतारा जाय। व्यायाम किए बिना कोई पहलवान कहाँ बन पाता है?
 इसी प्रकार धर्म के तत्त्वज्ञान को व्यावहारिक जीवनचर्या में उतारने के
 अतिरिक्त और कोई विकल्प है नहीं।