मंगलवार, मई 15, 2012

गुरुत्वाकर्षण की खोज मह्रिषी भाष्कराचार्य द्वारा प्रमाण सहित...

























हम सभी विद्यालयों में पढ़ते हैं की न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की खोज की थी, पर आप को ये जान कर कैसा लगेगा कि गुरुत्वाकर्षण का नियम सर्वप्रथम न्यूटन ने नहीं बल्कि एक हिन्दू ने खोजा था?
इसिलिए हमें हिन्दू होने पर गर्व है!

जिस समय न्यूटन के पूर्वज जंगली लोग थे ,उस समय मह्रिषी भाष्कराचार्य ने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर एक पूरा ग्रन्थ रच डाला था ।

भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है।

"मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो,विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।"
सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश

आगे कहते हैं-
"आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं,गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति,समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।"
- सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं। 

ऐसे ही अगर यह कहा जाय की विज्ञान के सारे आधारभूत अविष्कार भारत भूमि पर हमारे विशेषज्ञ ऋषि मुनियों द्वारा हुए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ! सबके प्रमाण भी उपलब्ध हैं !

सोमवार, अप्रैल 16, 2012

पूरी कायनात मे, पूरी दुनिया मे सिर्फ़ ध्वनि पैदा होती है, शब्द नही.....



















 
 
एक बार किसी बच्चे ने मुझ से पूछा कि "ओम नम: शिवाय" का क्या मतलब है? तो मैने कहा कि इसका मतलब है भगवान शिव को नमस्कार करो या मैं भगवान शिव को नमस्कार करता हूँ. तो वो बोला इसमे मंत्र क्या हुआ? मैं सोच मे पड़ गया कि वाकई ही इसमे मंत्र क्या हुआ? 
मेरे एक पेशेंट  थे, शर्मा जी. उन्होने 3-4 दिनो तक पत्नी संग महामृत्युंज मन्त्र का जाप करवाया और उसके पूरा होने के दो दिन बाद हार्ट फेल से मृत्यु को प्राप्त हो गये! आख़िर महामृत्युंज मन्त्र ने अपना काम क्यों नही किया?
 डॉ शिवानंद, जी ने  अपनी एक पुस्तक मे गायत्री मंत्र के बारे मे लिखा कि इसका जाप करने से आदमी स्मस्त तरह की बीमारी से मुक्त हो जाता है! ये बात एक जर्मन जर्नलिस्ट ने पढ़ी और उछल पड़ा !! उसने सोचा ये आदमी जीनियस है जिसने इतनी बड़ी ईजाद कर दी, दुनिया भी पागल है पता नही किस किस को नोबल पुरस्कार दे देती है. इस डॉ शिवानंद को देना चाहिए. सारी बीमारियाँ एक झटके मे ख़तम!! उसे शक की कोई गुंजाइश भी नही लगी क्योंकि शिवानंद एक क्वालिफाइड डॉक्टर था सो ऐसा आदमी जब अध्यात्म मे उतरेगा तो तत्थ के साथ ही बोलेगा! पूरा निरीक्षण करके ही बोलेगा! अब उस बेचारे को क्या पता हिन्दुस्तान मे ऐसे बोलने वाले गली गली मे मिल जाएगें! क्या डॉ और क्या इंजिनियर यहाँ सारे पढ़े लिखे पागल बसते है! विज्ञान पढ़ लिया है पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी का नही है. इन शॉर्ट वो जर्नलिस्ट भारत आया और ढूँढता ढूँढता डॉ शिवानंद के आश्रम पहुँच गया, उसे वहाँ शिवानंद का एक चेला मिला तो उसने चेले से कहा कि मुझे डॉ. शिवानंद से मिलना है तो चेला बोला कि आप अभी गुरुजी से नही मिल सकते. कारण पूछने पर चेले ने बताया कि गुरुजी बीमार है सो अभी नही मिल सकते, दो चार दिन बाद आना! वो जर्मन जर्नलिस्ट तो हैरान रह गया, उसने कहा कि खुद शिवानंद ने लिखा है कि इस मंत्र से समस्त बीमारियाँ ठीक हो जाती है तो वो इसका जाप करके ठीक क्यों नही हो जाते! अब चेला बेचारा क्या बोलता, असलियत तो सभी को पता है! असल धंधा कुछ और होता है, ये तो दिखावे के बोल बचन है. खैर चेले ने उसे सारी असली बात बता दी कि ऐसा कहते है पर होता कुछ नही! वो बेचारा जर्नलिस्ट तो शॉक्ड रह गया " इतना बड़ा फ्रॉड!" वो वापस जर्मनी चला गया और वहाँ उसने क्या लिखा वो जाने दो..... समझ सकते हो कि हिन्दुस्तानियो के बारे मे क्या लिखा होगा :-)
वेल्ल कुल सार इतना है कि क्या ये बाते वाकई ही झूठी है? मंत्र अपना काम क्यों नही करते? हमारे ऋषि मुनि क्या ग़लत थे या मंत्र ही ग़लत है !
दरअसल हिंदू धर्म मे विधियाँ और सिद्धियाँ पाने के तीन तरीके है : तंत्र, मंत्र और यंत्र. हमारा सारा तप और योग इन्ही तीन चीज़ो द्वारा संपन्न होता है. भक्ति अलग चीज़ है. भक्ति की शक्ति भगवान पर, आस्था पर खड़ी है! भगवान नही है तो भक्ति भी पैदा नही हो सकती! तप और योग किसी भगवान की शक्ति को नही बल्कि अपनी अंदरूनी शक्तियो को जगाने के तरीके है. सारा खेल उर्जा को जगाने, उठाने के लिए है. उर्जा कंट्रोल हो गई तो बड़े बड़े काम सिद्ध होने लगते है. यानी प्यूर्ली गेम ऑफ पावर!
ऋषि मुनियो ने बहुत समय तक ये कहा कि शास्त्र ना लिखे जाए वैसे भी शास्त्र कहा जाता था, बताया जाता था. सिखाया जाता था पर लिखा नही जाता था! लिखा हुआ शास्त्र नही होता, किताब या ग्रंथ होता है. पर बेवकूफ़ ब्राह्मणवाद ने इसे लिख दिया और यही से इसका सारा प्रभाव खो गया! ऋषि मुनि अपने गुरुकुल मे शिष्यो को मंत्रो का उच्चारण सिखाया करते थे जो मौखिक था, लिखित नही!! कहाँ सुर लंबा करना है और कहाँ धीमा, सब सिखाया जाता था. बिल्कुल वैसे ही जैसे आप गायकी सीखते है, सब रियाज़ पे डिपेंड करता है ना की पढ़के रटना है! मंत्र सारा खेल ध्वनि का है और ध्वनि लिखी नही जा सकती! शब्द लिखा जा सकता है!! और आज आप शब्द बोल रहे हो ना की ध्वनि निकाल रहे हो तो मंत्र असर कैसे करेगा? आप किसी को किस करते हो अगर उसे लिखोगे तो किस की आवाज़ को कैसे लिखोगे? "पुच्च या अक्स" पर ये तो शब्द बन गया ये वो सही  ध्वनि नही है जो किस करते समय निकली थी! महत्व ध्वनि का है और हम शब्द मे उलझ जाते है. ट्रिन ट्रिन, क्लिक, टिप टिप , पुच्च, ह्म्म, पियू, भो भो, टन टन, छीशी, उँआं, छुक छुक, ढम ढम, ठक ठक, सर्ररर, पर्र्ररर, छिंन्न्न्, छपाक इत्यादि सब ध्वनि को शब्दो मे बदला गया है! आप इसे भाषानुसार पढ़ोगे तो कुछ हासिल नही होगा, सही  ध्वनि सुनोगे तो दिलो दिमाग़ पे असर होगा !!  ध्वनि एक उर्जा है जो मंत्रो मे व्याप्त होती थी और असर उसी का होता था नाकी शब्दो का ! मंत्रो से ही संगीत और गायकी निकली, शास्त्रीय संगीत या गायन मे जो प्रभाव है उसका बेस वही ध्वनि है जो मंत्रो मे होती है. सुबह, दोपहर, शाम और रात के मूड के हिसाब से राग बनाए गये. अब उस रागो के असर से आप मंत्र के असर को समझ सकते है. जीवन के खास खास मौको के लिए खास खास मंत्र बनाए गये ताकि तनाव ना रहे.
ओम भी एक शब्द है जिसे लिखा गया है वरना इसका उच्चारण एक गूँज है बस, पेट फेफड़ो और गले से आती हुई हवा की आवाज़ पर हम इसे लिखेगें 'ओम' ! अब 'आ' पे कितना ज़ोर देना है या 'ओ' पे कितना या 'म' पे कितना, कुछ पता नही. तो सही सही उच्चारण निकलेगा कैसे? जब ओरिजनल उच्चारण ही नही निकलेगा तो मंत्र अपना काम कैसे करेगें! काम तो उन ध्वनियो ने करना था जो हमने निकाली ही नही! सो लिखे हुए मंत्र सब वेस्ट हो गये और हम आज खा मा खा के शब्दो से खेल रहे है.
पूरी कायनात मे, पूरी दुनिया मे सिर्फ़ ध्वनि पैदा होती है, शब्द नही! हवा की सायँ सायँ, पेड़ो के पत्तो की आपस मे टकरा कर आती आवाज़, पानी का कल कल, जानवरो की आवाज़े, पंछीयो की चहचाहट, मशीनो की आवाज़, हमारे कदमो की आहट इवन हमारी हँसी, रोना, चीखना सारे भाव सिर्फ़ ध्वनि पैदा करते है. शब्द हमारी इज़ाद है और अपनी इस मेनमेड थिंग के कारण हम असली शक्ति (ध्वनि) से दूर होते चले गये! सच कहूँ तो बिना शब्द के जो ध्वनि हम सुनते है उससे हम सही नतीजे पर पहुँच जाते है, शब्द उल्टा भटका देते है. अँधा आदमी या कोई बच्चा या पागल...  कोई भी हो ध्वनि सुनकर सब समझ जाएगा कि क्या हुआ है! शब्द झूठ बोल सकते है पर ध्वनि कभी झूठ नही बोलती.
आज यही हाल मंत्र का है! हम शब्द और उसका भावार्थ की पढ़ते और समझते है पर उसका असर या आउटपुट निल्ल बटा निल्ल. ऋषियो ने जो बरसो मेहनत करके ध्वनि इज़ाद की थी जिससे वो हर चीज़ को बाँध लेते थे, उसके असर से ख़तरनाक जानवर और आधियों को भी रोक लेते थे इवन बरसात भी ले आते थे और दूसरी शक्तियो को भी बाँध लेते थे. सब खो गया!! क्योंकि दूसरो को मंत्र सीखने सिखाने मे ज़्यादा मेहनत ना करती पड़े इसके लिए ब्राह्मणवाद ने इसे लिख दिया और लिखते ही सारा असर उड़ान छू!! संगीत की तरह इसे रियाज़ और उच्चारण पर रखते तो शायद आगे ओर कमाल कर सकते थे. अब ओम भुर्भुव: स्वाहा करो या ओम ब्लिंग ब्लोंग ब्लांग करो, कोई फ़र्क नही पड़ने वाला. आज मंत्र सिर्फ़ एक कोट और उसका मतलब बनकर रह गया. आपने एक शब्द सुना होगा "मंत्र मुग्ध" हो जाना यानी बँध जाना, आज ऐसा नही होता क्योंकि मंत्रो मे मौजूद मुग्ध करने वाली ध्वनि नदारद है. अपने बनाए शब्दो से खेलते रहिए. हवन करिए या शादी के मंत्र पढ़िए, कुछ शुभ लाभ नही होना!

सोमवार, अप्रैल 09, 2012

स्मरण शक्ति बढ़ाने का व्यायाम...........























 
 
सुने हुए शब्दों का स्मरण करने के लिये यह अभ्यास
 अच्छा है कि किसी मेले आदि ऐसी जगह में जावें, 
जहाँ शोरगुल हो रहा हो और अनेक प्रकार की आवाजें 
आ रही हों। इन आवाजों में से किसी एक प्रकार के शब्द
 पर अपना ध्यान जमाइए, जैसे तांगा चलने की खड़-खड़ 
के ऊपर चित्त को केंद्रित करके उन्हीं का शब्द सुनिये और
 इससे उनकी दूरी, तेजी, संख्या, पहिये आदि के बारे में
 अनुमान लगाइये। अन्य प्रकार के शब्दों पर से मन को 
रोक कर तांगो की खड़खड़ पर ही मन लगाना चाहिए।
 इसी तरह ग्रामोफोन के रिकार्डों या किसी बातचीत को 
शोरगुल के बीच में ठीक प्रकार सुनने का प्रयत्न कीजिए।
 बड़े-बड़े वाक्यों को सुनकर उन्हें लिखिए। इस प्रकार के 
अभ्यासों से कर्णेद्रिय की सहायता से स्मरण शक्ति बढ़ाई 
जा सकती है।


शनिवार, मार्च 31, 2012

पाप कर्मों से बचाव...........
























 
बुरे विचार, नीच कर्मों को करने की इच्छाएँ एक प्रकार 
की दाहक चिनगारियाँ हैं, जो जहाँ रहती हैं, वहाँ के पदार्थों
 को जलाती हैं । कोई मनुष्य आग की लपटों से खेलना चाहे 
तो वह बिना झुलसे बच नहीं सकता । यदि आपकी बुद्धि छल, 
दंभ, द्वेष, दुराचार, क्रोध, कलह में लगी रहती है, तो निश्चय
 समझिये कि आप चाहे सरस्वती के पुत्र ही क्यों न हों, कुछ
 ही समय में बाजारू गुंडों की श्रेणी में पहुँच जायेंगे ।

सद्बुद्धि उन्हें हो सकती है, जिनका जीवन व्यवस्थित और संयत है 
एवं जो दुर्गुणों की नहीं, सतगुणों की उपासना करते हैं । सत्यनिष्ठा, 
प्रेम, उदारता, सरलता, दया, सेवा, आत्मीयता, स्वतंत्रता आदि गुणों
 के पौधों के साथ-साथ सद्बुद्धि की लता भी बढ़ती है । यह लता-गुल्म 
एक ही क्यारी में उगे हुए हैं, दोनों की एक खुराक है । याद रखिये कि जिसके सद्गुण सूख जायेंगे-उसकी सद्बुद्धि भी हरी न रह सकेगी, 
इसलिए जो बुद्धिमान् बनना चाहता है, उसे सद्गुणी भी बनना चाहिए ।

बुधवार, मार्च 14, 2012

अभ्यास से उन्नति.........





















अभ्यास से उन्नति जीवन का अखंड नियम है,
 क्योंकि इससे आत्मा की प्राणशक्ति को अधिक
 क्रिया करनी पड़ती है और वह नित्य व्यवहार में
 आने वाले चाकू की तरह मुर्छा आदि से मुक्त रहकर
 तेज ही होती है। शारीरिक और मानसिक विकास 
के शास्त्रीय सिद्धांतों पर विचार करने से यह सिद्ध 
होता है कि मानसिक विकास करना, अपनी बुद्धि 
को बढ़ाना, मनुष्य के अपने हाथ में है और वह
 प्रयत्नपूर्वक बुद्धिमान् बन सकने में सर्वथा स्वतंत्र है।

शुक्रवार, फ़रवरी 24, 2012

योग के माध्यम से...........























यदि आपकी फिटनेस सही नहीं है तो लुक को चेंज 
करने के मार्केट में प्रचलित सारे कास्ट्यूम आपके
 लिए व्यर्थ है। आप जमाने के साथ टिक नहीं सकते। 
कितने ही अच्‍छे कपड़े पहन लें, लेकिन आपकी बॉडी 
यदि बेढप है तो वे कपड़े शायद ही सुटेबल लगे।

इसीलिए अब योग के माध्यम से प्राकृतिक सौंदर्य 
और कोमल देह की चाहत रखने वालों की संख्या बढ़ रही है।
 सभी को यह अहसास होने लगा है कि योग के माध्यम से
 सुंदर और सेक्सी बना रहा जा सकता है। प्राणायाम जहाँ 
हमारे जीवन की दीर्घता बढ़ाता हैं वहीं आसन हमारे शरीर
 को सेहतमंद और जवान बनाए रखने में सक्षम हैं।

गुरुवार, फ़रवरी 23, 2012

योग का विराट और व्यापक स्वरुप.......


















"जब हम योगाभ्यास करते हैं तो बाहरी आलंबन
 नहीं लेने पड़ते हैं अपितु हमारे भीतर से ही हारमोंस
 का श्राव होने लगता है |हमारी रासायनिक प्रक्रिया
 संतुलित हो जाती है |शरीर का Anabolism ,
Catabolism,Metabolism rate
अर्थात वात् ,पित्त ,कफ सम अवस्था मे आ जाते हैं ,
मन शांत हो जाता है ,गहरा संतोष भीतर से मिलता है |
अतः सारा अवसाद दूर हो जाता है तथा भगवदीय कृपा 
के प्रसाद से जीवन मे पूर्णता की अनुभूति होने लगती है ,
यही योग का विराट या व्यापक स्वरुप है |"

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

जीवन डोर प्रभु के हाथों में..........


























जीत उन्हीं की होती है जो भौतिक शक्तिओं तक
ही सीमित न रह कर परमात्मा को अपने जीवनरथ
का सारथी बना लेते हैं।ईश्वर विश्वास के लिए श्रद्धा
का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भौतिक जीवन तथा शारीरिक
क्षेत्र में प्रेम की सीमा होती है। जब यही प्रेम आन्तरिक
अथवा आत्मिक क्षेत्र में काम करनेलगता है, तो उसे श्रद्धा
कहते हैं। यह श्रद्धा ही ईश्वर-विश्वास का मूल स्रोत है एवं 
श्रद्धा के माध्यम से ही उस विराट की अनुभूति सम्भव है।
श्रद्धा समस्त जीवन नैया की पतवार को ईश्वर के हाथों सौंप
देती है। जिसकी जीवन डोर प्रभु के हाथों में हो भला उसे क्या
भय ! भय तो उसी को होगा जो अपने कमजोर हाथ पाँव
अथवा संसार की शक्तियों पर भरोसा करके चलेगा। जो प्रभु का
आंचल पकड़ लेता है, वह निर्भय हो जाता है, उसके सम्पूर्ण
जीवन से प्रभु का प्रकाश भर जाता है। तब उसके जीवन
व्यापार का प्रत्येक पहलू प्रभु प्रेरित होता है, उसका चरित्र 
दिव्य गुणों से सम्पन्न हो जाता है।

गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

स्वस्थ व्यक्ति की दिनचर्या..........

















स्वस्थ व्यक्ति की दिनचर्या के अंतर्गत आज हम अन्य बिंदुओं पर प्रकाश डालेंगे :-

निद्रा --भगवान ने प्रकृति को कुछ ऐसे नियमों में बाँधा है की मनुष्येतर प्राणी पशु ,पक्षी सायंकाल होने पर अपने अपने ठिकानों पर चले जाते हैं |ये अभागा मनुष्य ही उल्लू की तरह रात भर जागता है और ब्रह्म्बेला का आनंद लिए बिना पड़ा रहता है |
स्वस्थ व्यक्ति को 5-6 घंटे की नींद पर्याप्त है |बच्चों और वृद्ध लोगों को कम से कम 8 घंटे सोना चाहिए |

1-अगर रात में नींद नहीं आ रही हो ,धरती माँ के पैर छुएं और सीधे लेटकर 100 से 1 तक उलटी गिनती मन ही मन में ओम के साथ करें धीरे -धीरे नींद आ जायेगी |

2-ब्रह्मचर्य--अपनी इन्द्रियों एवं मन को विषयों से हटाकर ईश्वर एवं परोपकार में लगाने का नाम ब्रह्मचर्य है |केवल उपस्थ इन्द्रिय का संयम -मात्र ही ब्रह्मचर्य नहीं है |

3--स्नान --रोगी को छोड़ कर सामान्य व्यक्ति को ठन्डे पानी से स्नान करना चाहिए |गर्म पानी से स्नान करने पर मन्दाग्नि एवं दृष्टि दुर्बलता इत्यादि रोग हो जाते हैं |असमय में ही बाल सफ़ेद होने एवं गिरने लगते हैं |
स्नान के बाद शरीर को खादी के तौलिए से रगड़ केपोंछना चाहिए |यदि कब्ज है पेट को रगड़ कर पोंछना चाहिए |

4-व्यायाम --बिना व्यायाम के शरीर अस्वस्थ तथा ओज -कांतिहीन हो जाता है |जबकि नियमित रूप से वायाम करने से दुर्बल ,रोगी एवं कुरूप व्यक्ति भी बलवान स्वस्थ एवं सुन्दर हो जाता है |

ह्रदय रोग ,मधुमेह मोटापा ,वातरोग ,बवासीर गैस ,रक्तचाप ,मानसिक तनाव आदि का भी मुख्य कारण शारीरिक श्रम का अभाव है |इनमे आसान -प्राणायाम सर्वोत्तम है |इससे शरीर के साथ मन में एकाग्रता एवं शान्ति का विकास होता है |

गुरुवार, फ़रवरी 02, 2012

कुछ अनुभूत टोटके.............
















कौऐ का एक एक पूरा काला पंख कही से मिल जाए जो 
अपने आप ही निकला हो उसे “ॐ काकभूशुंडी नमः सर्वजन
मोहय मोहय वश्य वश्य कुरु कुरु स्वाहा”इस मंत्र को बोलते 
जाए और पंख पर फूंक लगाते जाए, इस प्रकार १०८ बार करे. 
फिर उस पंख को आग लगा कर भस्म कर दे. उस भस्म को
अपने सामने रख कर  लोबान धुप दे और फिर से १०८ बाद 
बिना किसी माला के अपने सामने रख कर दक्षिण दिशा की 
और मुख कर जाप करे. इस भस्म का तिलक ७ दिन तक करे.
तिलक करते समय भी मंत्र को ७ बार बोले. ऐसा करने पर सर्व
जन साधक से मोहित होते है
 

"मोर के पंख को घर के मंदिर मे रखने से समृद्धि की वृद्धि होती है"

सभी इन्द्रियों को संयमित किया जाए.....

























घड़ी के पुर्जों में जैसे एक चक्र दूसरे चक्र से
संबन्धित रहता है, मशीनों में एक पुर्जा दूसरे 
पुर्जे को चलाता है उसी प्रकार इन्द्रियों में भी
एक इन्द्रिय दूसरी इन्द्रिय को प्रेरणा देती है |
उदाहरण के लिए आँख ने कोई सुन्दर वस्तु देखी,
आँख ने वह सन्देश मस्तिष्क तक पहुँचाया, मन 
ने उसे प्राप्त करने की आकांक्षा की, बुद्धि ने उसके 
लिए योजना बनायी, पैर उस वस्तु तक पहुँचे और 
हाँथों ने उसे पकड़ा |काम विकार के उमड़ने और 
मर्यादाओं का उल्लंघन होने में भी यही प्रक्रिया 
काम करती है | इसीलिए कहा गया है कि ब्रह्मचर्य 
की आवश्यकता केवल शरीर संयम से ही पूरी नहीं 
हो जाती उसके लिए अपने सभी आधार व्यवहारों 
को ही संयमित करना पड़ता है |

शनिवार, जनवरी 28, 2012

ब्लडप्रेशर को जड़ से मिटाने के लिए.......




















अधिकांशत: बीमारियों के उपचार के लिए लोग नियमित रूप से दवाईयों का सेवन करते हैं। लेकिन ब्लडप्रेशर और तनाव दोनों ही ऐसी बीमारियां हैं जिन्हें दवाईयों से जड़ से मिटाना थोड़ा मुश्किल है। कहते हैं जिन रोगों को सिर्फ औषधीयों से नहीं मिटा जा सकता है उनका उपचार योग व ध्यान से संभव है। इसीलिए कान्स्टीपेशन, तनाव या हाई ब्लडप्रेशर को जड़ से मिटाने के लिए सिर्फ रोज दस मिनट के लिए नीचे लिखी विधि से ध्यान करें।

ध्यान विधि- शरीर को ढीला छोड़ दीजिए, ध्यान रहे कमर झुकनी नहीं चाहिए।

- बंद आंखों से अपना पूरा ध्यान मूलाधार क्षेत्र में ले आइए।

- पूरा ध्यान बंद आंखों से वहीं एक जगह पर केन्द्रित करिए, गुदा द्वार   को ढीला छोड़ दीजिए।

- लिंगमूल को ढीला छोड़ दीजिए।

- इससे सांस की गति अचनाक गहरी और तीव्र हो जाएगी।

- अपने सांस पर ध्यान दीजिए।

- अब अपना पूरा ध्यान नासिका पर ले आइए।

- इसके बाद अपनी सांस को गौर से देखिए।

- कम से कम 30 सांस तक आप इसी अवस्था में रहें।

- अब देखिए ध्यान में जाने से पहले और अब में कितना फर्क पड़ा है।

शुक्रवार, जनवरी 27, 2012

पूज्य पिताजी, आपके ताने हमें सोने नहीं देते..

















पूज्य पिताजी, आपके ताने हमें सोने नहीं देते, नौकरी मिलने दीजिये,मै इस देश 
को लूट डालूँगा और आपका पूरा पैसा १०० गुना वापस करूँगा.... 
दोस्तों, एक बाप क्या चाहता है, की उसका बेटा भी अच्छी शिक्षा लेकर एक नैतिक नागरिक बन जाये, परन्तु देश के लुटेरो ने भारतीय शिक्षा के मायने ही बदल दिए है और इसका व्यवसायीकरण कर दिया है, जानिए--- 
१-उ.प्र में आजकल जितने स्कुल और कालेज खुल रहे है सब का मालिक यातो विधायक है, या संसद है या मंत्री है, 
२-शिक्षा के  बदले एक मोटी रकम की फीस ली जाती है, 
३-माँ-बाप जितनी बार फीस देते है उतनी बार अपनी संतान को कोसते है की अभी कितने दिन और पढ़ेगा. 
४-बार बार ताने सुनकर संतान यही सोचते है की जल्दी से नौकरी मिल जाये और इस देश को लूट डाले. 
५-आज की शिक्षा में तो वैसे ही नैतिक शिक्षा हटा दी गयी है दोष  चाहे जिसका हो, 
सरकारे तो स्कुल खोलने से जानबूझ कर बच रही है जिससे की मंत्री जी को मौका मिले 
स्कुल खोलने का, और अपने बेटो के लिए एक स्थायी आय को श्रोत पैदा कर दे रहे है, 
ये अनपढ़ संताने स्कुल का प्रबंधक बनकर शिक्षा का बंटाधार  कर रहे  है, 
यदि पढाई के समय से ही छात्रो में धन कमाने की कुंठा घर कर जाए तो इस देश के लिए कौन पढ़ेगा और किसके पास ईमानदारी बचेगी, यह देश तो अंग्रेजो की साजिस का पूरी तरह शिकार होकर रह गया है, क्या होना चाहिए- 
१-सभी शिक्षा मात्री  भाषा और राष्ट्र भाषा में दी जाये, 
२-शिक्षा निशुल्क होना चाहिए,शिक्षण सामग्री सस्ती होने चाहिए, हर साल किताबे न बदली जाये, 
३-शिक्षा में नैतिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए, हमारे पूर्वजो के बारे में बताया जाये न की विदेशी लुटेरो के बारे में. 
४-शिक्षा और शिक्षक तथा पूरे संसथान  का पूरा खर्च सरकार उठाये, 
५-शिक्षा में राष्ट्रीय विषय और शामिल किये जाये और छात्रो को वास्तविक इतिहास पढाया जाये, 
६-तब यदि बेटा किसी राष्ट्र सेवा के चुना जाये तो माँ-बाप को गम नहीं होगा क्योंकि खर्चा राष्ट्र दे रहा है. छात्रों में इमानदारी  आयेगी और राष्ट्र महान बनेगा. 
७-यह सत्य है की देश में पैसे की कमी बिलकुल नहीं है, देश का ४००लाख करोड़ रुपये विदेशी बैंको वैसे ही पड़े है. 
८-सारी समस्या का सिर्फ एक ही जड़ है- भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार नेआदमी को भ्रष्टाचारी होने  के लिए मजबूर कर दिया है, अनचाहे मन से घुस देनी पड़ती है. 
९- ध्यान से सोचिये-नक्सली समस्या की जड़ में क्या है, आज़ादी के बाद गरीबो को और गरीबी मिली और सक्षम लोगो ने देश को लूट डाला, एक गरीब को आत्मघाती और नक्सली  बनने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती है, जब की धनी आदमी पैसो को आराम से भोगने के लिए गुंडों को हफ्ता भी देता रहता है,                                                                                         
१०-शिक्षा के खर्च ने लोंगो को तबाह कर दिया है और लोग अपने बच्चो को अब 
इमानदार रहने की शिक्षा देना भूल जा रहे है.

शुक्रवार, जनवरी 20, 2012

दिखावे पर मत जाओ अपनी अकल लगाओ......













चीनी, कैँडी और च्युइँगगम का प्रयोग बंद करो और यदि मीठा खाना ही है तो गुड़ खाओ!
जानिए चीनी का प्रयोग कैसे हानिकारक है और गुड़ किस प्रकार लाभदायक है!
1- चीनी मिलें हमेशा घाटे में रहती हैं। चीनी बनाना एक मँहगी प्रक्रिया है और हजारों करोड़ की सब्सिडी और चीनी के ऊँचे दामों के बावजूद किसानों को छह छह महीनों तक उनके उत्पादन का मूल्य नहीं मिलता है!
2-चीनी के उत्पादन से रोजगार कम होता है वहीं गुड़ के उत्पादन से भारत के तीन लाख से कहीं अधिक गाँवों में करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है।
3- चीनी के प्रयोग से डायबिटीज, हाइपोग्लाइसेमिया जैसे घातक रोग होते हैं!
4-चीनी चूँकि कार्बोहाइड्रेट होता है इसलिए यह सीधे रक्त में मिलकर उच्च रक्तचाप जैसी अनेक बीमारियों को जन्म देता है जिससे हर्ट अटेक का खतरा बढ़ जाता है!
5-चीनी का प्रयोग आपको मानसिक रूप से भी बीमार बनाता है। यहाँ पढ़ें www.macrobiotics.co.uk/sugar.htm
 

6-गुड़ में फाइबर और अन्य पौष्टिक तत्व बहुत अधिक होते हैं जो शरीर के बहुत ही लाभदायक है!
7-गुड़ में लौह तत्व और अन्य खनिज तत्व भी पर्याप्त मात्रा में होते हैं!
8- गुड़ भोजन के पाचन में अति सहायक है। खाने के बाद कम से कम बीस ग्राम गुड़ अवश्य खाएँ। आपको कभी बीमारी नहीं होगी!
9-च्युइँगगम और कैँडी खाने से दाँत खराब होते हैं!
10-गुड़ के निर्माण की प्रक्रिया आसान है और सस्ती है जिससे देश को हजारों करोड़ रुपए का लाभ होगा और किसान सशक्त बनेगा!
जय हिंद! जय भारतवर्ष!! 

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

अहंता का नियंत्रण..........

 
अहंकार के कारण भी अपनी मानसिक शक्तियाँ 
बर्बाद होती रहती हैं। अपने बारे में औरों की राय 
जानने की इच्छा, चर्चित होने की आकांक्षा, दूसरों 
से प्रशंसा सुनने और करवाने की अपेक्षा आदि कितने 
ही रूपों में अहंता व्यक्ति के मन मस्तिष्क में उठती-उमगती 
रहती है। इस तरह की इच्छा और अपेक्षा के मूल में अहंता ही
मूल कारण है।

दूसरों से प्रशंसा सुनने या उनकी राय जानने का 
एक ही उद्देश्य है अपने को महत्वपूर्ण अनुभव करना।
अपने को महत्वपूर्ण अनुभव करने या व्यक्त करने के 
लिए मनुष्य का मस्तिष्क ऐसी उधेड़बुन में उलझ जाता है
कि फिर वह अपनी सारी विचार-शक्ति को उसी ताने-बाने में 
उलझा देता है। महत्वकांक्षा कोई बुरी बात नहीं है पर जब वह
अहंकार का पोषण करने के लिए ही की जाती हो तो मस्तिष्क
फिर उसी दिशा में सोचने के लिए व्यस्त हो जाता है। उस दशा 
में रचनात्मक चिंतन की दिशा ही नहीं सूझती।
 
हमेशा अपने विचारों, शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखें. हमेशा अपने विचारों को शुद्ध करने का लक्ष्य रखें और सब कुछ ठीक हो जायेगा..........